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अपने भाव 33

                                                                    अपने भाव   विचार के बीच से ही कर्म का फल बनता है। इसीलिए सिर्फ शुद्ध विचारों के ही बीज बोने चाहिए। जैसे कि श्रेष्ठ फल की प्राप्ति हो सके। हम क्या करते है इसका महत्व कम है ,परतुं उसे हम किस भाव से करते है इसका महत्व बहुत है।  अंदर के भाव मे बड़ी ताकत होती है। जेसे भाव होते है वेसे कर्मबंदन होते है।  हम कोई भी क्रिया करते है, उसमे भी जेसे भाव होंगे वेसा ही फल मिलेगा। जेसे हम जो बोलते हे वो सामने वालेको पता चलता है , जो हम क्रिया करते है वो दिखाई देता है, पर हमारे अंदर जो विचार चल रहे है वो किसी को भी दिखाई नहीं देते हे,पर उसी भाव से कर्म a/c बनता है   जेसे सुबह में हमने चाय बनाई, गरम गरम चाय हमने कप पे निकाली और  अचानक फोन आ गया और हम ने ये सोचा के चाय तो मुझे गर्म ही पसंद हे...